Sunday, October 25, 2026
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उत्तराखंड का लोकपर्व घी संक्रांति आज, जानिए इस लोकपर्व को मनाने की वजह

देहरादून- उत्तराखण्ड के पहाड़ी समाज की आजिविका लोक संस्कृति से जुड़ी हुई है। यहॉ के निवासियों द्वारा हर माह में लोक पर्व मनाने की पंरपरा है। मूलतः पहाड़ी समाज भी आदिवासी समाज है, यहॉ की भौगोलिक परिस्थिति विकट होने के कारण यहॉ की आजिविका भी विकट थी, विकट आजीविका को सुगम बनाने के लिए यहॉ के निवासियों द्वारा कड़ी मेहनत की जाती थीं।

अतः जीवन में मनोरंजन के महत्व को सीधें लोक पर्वो सें जोड़ दिया गया। यहॉ का आजिविका का मुख्य आधार खेती और पशुपालन रहा है। खेती और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं, बिना खेती का पशुपालन संभव नहीं था और बिना पशुओं के खेती करना संभव नहीं था। ऐसे में उत्तराखण्ड के लोक समाज का लोक पर्व भी खेती और पशुपालन से जुड़ा हुआ था।

आज उत्तराखण्ड का लोक पर्व घी संग्राद है। धार्मिक मान्यता के अनुसार आज कर्क संक्रांति है, कर्क संक्रांति के दिन सूर्य सिंह राशि से कर्क राशि में प्रवेश करते हैं। हिंदू धर्म के पंचाग के अनुसार आज से भाद्रपद यानी भादों का महिना शुरू हो गया है। भादों माह से शरद ऋतु शुरू हो गयी है, अब धीरे धीरे बरसात कम होती जाती है, और धूप में तेज धूप लगती है, इस माह में धान और मंडुवा पर बाली आना शुरू हो जाता है, और झंगोरा पकने लग जाता है।

भादों के माह में सबसे अधिक गर्मी पड़ती है, इस माह मेंं शरीर में खुश्की अधिक होने के कारण शरीर खुश्क हो जाता है, ऐसे मे शरीर में तरल पदार्थ की जरूरत होती है। सावन माह में दूध दही और घी वर्जित माना गया है, भादो महिने से पुनः घी दूध का सेवन किया जाता है। सावन की संक्राति की शुरूवात खीर के साथ करने का प्रावधान रखा गया, वहीं भाद्रपद की संक्राति का शुभारंभ घी से किया जाता है। घी के सेवन से जहॉ शरीर की खुश्की मिट जाती है, वहीं शरीर बलिष्ठ होता है।

आज के दिन लोग भरी रोटी को घी में डूबोकर खाते हैं, कुछ घी शरीर पर और विशेषकर हिंदूं लोग अपनी चोटी या सिर पर मलते हैं। इसी के साथ काश्तकार आज के दिन अपने बैलों को भी घी पिलाता था। बैलों को घी पिलाने के पीछे बहुत बड़ा वैचारिक तर्क रहा है।

भादों माह में किसान अपने पशुओं को जो गोठ में रहते थे, ऐसें खेतों में ले जाते थे जिन पर साल भर से हल नहीं लगा हो, ऐसे खेतों में गोठ को ले जाया जाता था यहॉ लगभग एक माह तक गोठ रहती थी। उसके बाद धान और झंगोरा कटने के बाद गेहूॅं बोने से पहले खेतों में गोठ ले जायी जाती थी ताकि खेतों को खाद पानी और मिट्टी में उर्वरकता बनी रहे साथ ही खेतों में गोठ रहेगी तो हल लगाने और बरसाती झाड़ी की साफ सफाई हो सकती हैं।

साल भर बंजर पड़े खेतों में हल लगाना मुश्किल होता है, क्योंकि वहॉ पर दूब जड़ी होती है, घास की जड़े होती हैं, ऐसे में हल जोतने के लिए मजबूत और अनुभवी बैलों की जरूरत होती है, बैलों को हल खींचने में समस्या ना आये इसलिए उन्हे आज के दिन घी पिलाया जाता था, उनके सींगों पर भी धी लगाया जाता था।

शाम को लोग अरबी के पत्तों का पत्यूड़ बनाकर घी के साथ खाते थे, मूल रूप में यह त्यौहार पशुओं और खेती से जुड़ा लोक पर्व है। गाय भैंस को खरक कहा जाता था, उस समय किसान की जमा पूंजी पशु ही होते थे, एक खरक में लगभग 40 से अधिक पशु रहते थे। गॉव में जिन घरों में यदि किसी के यहॉ घी नहीं होता था तो गॉव के लोग उस परिवार को एक एक कटोरी घी श्रद्धा से देकर आते थे ताकि पर्व के दिन वह घी से बंचित नही रहे। यह थी आपसी सामाजिक व्यवस्था।

आज समाज में बदलाव आया है, खान पान रहन सहन सब बदल गया है आज के समय में घी पचाना भी मुश्किल है, और वह आर्गेनिक घी मिलना भी मुश्किल है। पहले कंकरयळू घी को सबसे अच्छा माना जाता था। आज हमारा शारीरिक कार्य कम और मानसिक कार्य ज्यादा हो गया है, अतः अब शरीर के सौष्ठव और बलिष्ठता बनाने के लिए उस मात्रा में घी खाना भी प्रतिकूल होता जा रहा है, यह हमारी जीवन शैली बदलने का प्रभाव है। अतः वास्तव में प्रकृति के करीब रहकर ही प्रकृति जनित चीजों का सेवन शरीर के लिए लाभकारी सिद्ध होता है। आईए अपने इस उत्तराखण्ड के लोक पर्व को मनायें और अपने भावी पीढी को इससे जोड़े।

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